
निर्झरी मैं
निर्मल सुंदर
क्या है उद्गम मेरा नही जानती
उतंग पहाड़ों का विलाप हूं
या महादेव की जटाओं से अच्युत
कोई जल धार
बस अब मै निर्झरी
गिरती ऊंचाईयों से बन निर्झर
चट्टानों से टकराती
फिर भी गुनगुनाती
कभी नही निश्चल निशब्द
मेरी अनुगूंज विराट तक
चल के गिरती फिर चलती
न रुकती न हारती कभी
गिरना चलना मेरी शान
कभी उदण्ड हो किनारे तोडती
मै निर्झरी
ऐसे पल भी आते
लगता पर्वतों का रुदन थम गया
मै रेत पर पसर तनवंगी सी
अपना अस्तित्व बचाने
स्वयं नैनो से अश्रु बहाती
इधर उधर फैला अपनी बांहे
रेत के बिछौने पर करवट बदलती
फिर नई भोर का इंतजार
जो मुझे फिर नव जीवन दे दे
भर दे मुझे फिर थला थल
मै निर्झरी ।
-कुसुम कोठारी
