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सोमवार, 10 जनवरी 2022

shayarikhanidilse : जाहिल

shayarikhanidilse : जाहिल:   जाहिल था, दिए उनके जहर को अमृत समझ कर पी गया, जर्रा-जर्रा करके बिखरा हूँ पतझड़ की तरहा , मासूमियत उनकी - बोले, जालिम क्या खूब जिंदगी जी गय...

सोमवार, 15 नवंबर 2021

दर्द का दिल में ठिकाना हो गया ..खरूदी राम जरयाल

जब कठिन रिश्ता निभाना हो गया
दर्द का  दिल  में  ठिकाना हो गया

प्रीत की चादर  पे  शर्तें  जब तनीं
लुप्त  सारा  ताना-बाना  हो  गया

वो  चले  जाने से पहले  कह  गए
खत्म अब  रिश्ता  पुराना हो गया

उन  सुहाने  मौसमों  के  वक्त  को
दिल से गुज़रे इक ज़माना हो गया

हम हकीकत  में न  जा पाए मगर
उनके दर सपनों में जाना हो गया

क्यों मेरी खुशियां जहां को चुभ गईं
हर नज़र का मैं निशाना हो गया

हर कदम सीखा बहुत कुछ ज़िन्दगी
बस तेरा मिलना बहाना हो गया
-खरूदी राम जरयाल

पिता का नाम: श्री खरूदी राम जरयाल
जन्मतिथि : 28-04-1969
शिक्षा : स्नातक , प्रभाकर

प्रकाशित साहित्य : 

कसक हिन्दी काव्य संग्रह , मधुमास ग़ज़ल संग्रह , दस साझा संग्रहों में रचनाएं प्रकाशित ।
पता : गांव व डाकघर बोह, उपतहसील दरीणी , तहसील शाहपुर ,
जिला कांगड़ा , हिमाचल प्रदेश । पिन कोड -176206 

शनिवार, 26 सितंबर 2020

विधवा....श्वेता सिन्हा

नियति के क्रूर हाथों ने

ला पटका खुशियों से दूर,

बहे नयन से अश्रु अविरल

पलकें भींगने को मजबूर।


भरी कलाई,सिंदूर की रेखा

है चौखट पर बिखरी टूट के

काहे साजन मौन हो गये

चले गये किस लोक रूठ के

किससे बोलूँ हाल हृदय के

आँख मूँद ली चैन लूट के


छलकी है सपनीली अँखियाँ

रोये घर का कोना-कोना

हाथ पकड़कर लाये थे तुम

साथ छूटा हरपल का रोना

जनम बंध रह गया अधूरा

रब ही जाने रब का टोना


जीवन के कंटक राहों में

तुम बिन कैसे चल पाऊँगी?

तम भरे मन के झंझावात में

दीपक मैं कहाँ जलाऊँगी?

सुनो, न तुम वापस आ जाओ

तुम बिन न जी पाऊँगी


रक्तिम हुई क्षितिज सिंदूरी

आज साँझ ने माँग सजाई

तन-मन श्वेत वसन में लिपटे 

रंग देख कर आए रूलाई

रून-झुन,लक-दक फिरती 'वो',

ब्याहता अब 'विधवा' कहलाई

-श्वेता


शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

उड़ान ...श्वेता सिन्हा

चलो बाँध स्वप्नों की गठरी

रात का हम अवसान करें

नन्हें पंख पसार के नभ में

फिर से एक नई उड़ान भरें


बूँद-बूँद को जोड़े बादल

धरा की प्यास बुझाता है

बंजर आस हरी हो जाये

सूखे बिचड़ों में जान भरें


काट के बंधन पिंजरों के

पलट कटोरे स्वर्ण भरे

उन्मुक्त गगन में छा जाये

कलरव कानन में गान भरें


चोंच में मोती भरे सजाये

अंबर के विस्तृत आँगन में

ध्रुवतारा हम भी बन जाये

मनु जीवन में सम्मान भरें


जीवन की निष्ठुरता से लड़

ऋतुओं की मनमानी से टूटे

चलो बटोरकर तिनकों को

फिर से एक नई उड़ान भरें

-श्वेता सिन्हा

मूल रचना

रविवार, 31 मार्च 2019

भारत के जावाज़ जवानों के नाम ....सुखमंगल सिंह

सीमा पर तैनात
भारत के जांबाज़ जवानों के नाम 


सीमा पर तैनात जवानों
कर दो बंद दुश्मन की बोली
मिटा दो कुल आतंकी टोली
पाक से खेलो जमके होली

सौ पर भारी एक जवान हो
तलुए तले अब पाकिस्तान हो
तिरंगा इस्लामाबाद में लहरे
वहां तलक अब हिंदुस्तान हो

खाली न जाए एक भी गोली
पाक से खेलो जमके होली

धरती मां की शान तुम्हीं से
साधु संतों का ध्यान तुम्हीं से
भारत का मान - सम्मान तुम्हीं से
जनगण मण का गान तुम्हीं से

युद्ध नहीं अब हंसी ठिठोली
खेलो पाक से जमके होली।।
-सुखमंगल सिंह,वाराणसी

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

बच्चे ने प्रश्न किया ....कुसुम कोठरी


बच्चे  ने प्रश्न किया 
ममता क्या होती है ? 
मां ने कहा
तू हंसता मै तुझ में जीती
ममता यही होती है।

बच्चे ने प्रश्न किया
मां तूं कैसे जीती है ? 
मां ने कहा 
तूं मेरा प्रति पल जीता 
और मैं तुझ में जीती। 

बच्चे ने प्रश्न किया
मां तूं क्यो रोती है ? 
मां ने कहा
कभी तुझे जब ठेस लगे
तेरे दर्द से मैं रोती।

अब मां  ने प्रश्न किया
तू कौन है? 
तुझ से अलग कहां हूं मैं
तू है तो मैं हूं
तेरा ही अस्तित्व हूं मैं
तूं नही तो क्या हूं मैं ? 

-कुसुम कोठरी।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

'मौन' बस बढ़ता चला जाता हूँ......अमित मिश्र 'मौन'

हर सुबह एक अलग नये सपने सजाता हूँ
शाम तलक उन्हें मैं खुद ही भूल जाता हूँ

ख्वाहिशें हज़ार ले कर रोज़ कमाने जाता हूँ
बेच के ईमान खाली जेबें नही भर पाता हूँ

है मेरा भी कोई अपना ये सब को बताता हूँ
पर हूँ सच में अकेला ये सबसे छुपाता हूँ

मिलेगा मौका हंसने का सोच के गम भुलाता हूँ
मुठ्ठी भर खुशियों को मैं फिर भी तरस जाता हूँ

हर दर पे हूँ भटकता तलाश तो पूरी हूँ करता
पर ढूंढ़ने क्या निकला ये समझ नही पाता हूँ

दिया जीवन खुदा ने तो कुछ मकसद होगा
ये सोच के यारों मैं मर भी नही पाता हूँ

बस थोड़ी है राहें अब जल्द मिलेगी मंजिल
ये सोच कर 'मौन' बस बढ़ता चला जाता हूँ
-अमित मिश्र 'मौन'