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रविवार, 14 जनवरी 2018

अलाव ....डॉ. इन्दिरा गुप्ता



जलता हुआ
अलाव 
जीवन का सा 
भाव ! 

कभी मद्दिम सा 
कभी ज्वलंत सा 
जलते भावों का सा 
ज्वाल ! 

चटख चटख कर 
कभी अंगारा 
तिक्त भाव कह
जाता ! 

फिर धीरे से मद्दिम 
होकर 
अंत काल बुझ 
जाता ! 
-डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍